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- कृषि समाचार

आम के बाग, जलवायु परिवर्तन रोकने में मददगार

  🚜 किसानों के लिए वरदान बन सकते हैं आम के बाग आज के दौर में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और घटती हरियाली ने जलवायु परिवर्तन को और घातक बना दिया है। इसका सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है, और बागवानी भी इससे अछूती नहीं रही। इस साल फरवरी और मार्च में दिन और […]

 

🚜 किसानों के लिए वरदान बन सकते हैं आम के बाग

आज के दौर में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और घटती हरियाली ने जलवायु परिवर्तन को और घातक बना दिया है। इसका सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ रहा है, और बागवानी भी इससे अछूती नहीं रही। इस साल फरवरी और मार्च में दिन और रात के तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

रात में तापमान कई बार 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला गया, जिससे आम में मंजर (फूलों) की संख्या कई जगहों पर घट गई या बिल्कुल नहीं आई। आम में मंजर का विकास सामान्यतः 12 से 15 डिग्री तापमान में होता है। दिन में तापमान 25 डिग्री हो तो ठीक रहता है, जबकि 27 से 33 डिग्री का तापमान आम के लिए आदर्श माना जाता है।

आम विशेष रूप से ठंड के प्रति संवेदनशील होता है। 0.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान युवा पेड़ों के लिए घातक हो सकता है, हालांकि परिपक्व पेड़ कुछ हद तक ठंड सहन कर सकते हैं।

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह
किसानों के लिए सुझाव

डॉ. एस.के. सिंह, विभागाध्यक्ष, प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, समस्तीपुर, बिहार के अनुसार आम के बागों की देखभाल में सावधानी जरूरी है। टिकोलो (फल के प्रारंभिक रूप) के बेहतर विकास के लिए नियमित सिंचाई जरूरी है।

अप्रैल में जब तापमान 40 डिग्री के पार पहुंचता है, तब फलों की गुणवत्ता और विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए। मिट्टी को नम बनाए रखें लेकिन जल-जमाव से बचें। पोषण के लिए गोबर की खाद श्रेष्ठ है और मधुआ (कीट) दिखे तो उचित कीटनाशक का प्रयोग करें।

फलों के झड़ने से किसान चिंतित न हों, क्योंकि 5 से 7 प्रतिशत झड़ना प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। डॉ. सिंह का सुझाव है कि रासायनिक खादों का अत्यधिक उपयोग न करें।

जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में मददगार हैं आम के बाग

पुरानी कहावत है कि आम के आम, गुठलियों के दाम। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि देश में आम के बागों ने वायुमंडल से 2.85 लाख टन कार्बन को सोख लिया है।

आईसीएआर के तहत भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गए रिसर्च में ग्राफ्टेड आम के पेड़ बायोमास के आकलन के लिए विकसित एक विशेष विधि का उपयोग करके भारत में उगाए गए आम के बागों में कार्बन स्टॉक का अनुमान लगाया गया है। करंट साइंस जर्नल के नवीनतम अंक में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है, “पूरे देश ने अपने आम के बागों में 285.005 मीट्रिक टन कार्बन संग्रहित किया है। हालांकि, यह जंगली बीजों से उगाए गए पॉलीएम्ब्रियोनिक आम के पेड़ों की तुलना में बहुत कम है।”

रिसर्च टीम ने कहा कि भारत में आम की खेती मुख्यतः बंजर भूमि पर की जाती है और उन्होंने सिफारिश की कि ऐसी भूमि को आम की खेती के अंतर्गत लाया जाना चाहिए। अध्ययन में कहा गया कि बंजर भूमि, जहाँ जंगल गायब हो गए हैं, को आम की खेती के अंतर्गत लाया जा सकता है, क्योंकि बाग, जो जंगलों की नकल करते हैं, उतनी ही मात्रा में कार्बन को सोखते हैं और जलवायु परिवर्तन के जोखिम को कम कर सकते हैं।

स्वास्थ्य और स्वाद दोनों में लाभकारी

आम में प्रोटीन, फाइबर,एंटीऑक्सीडेंट काफी मात्रा में होता है। इसके साथ ही आम की गुठली का पाउडर भी बेहद गुणकारी है। ये कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने में मदद करता है। दिल की बीमारियों के जोखिम को कम करता है। मजबूत दांतों के लिए इसका पाउडर इस्तेमाल कर सकते है। वजन कंट्रोल करने में भी ये सहायक माना जाता है। एनीमिया में अमचूर का इस्तेमाल और इसके अलावा आम के पल्प से जूस तैयार किए जाते है। आम का अचार और जेली तो लोग चटखारे लेकर खाते ही है। वैसे कहें तो आम में गुणों का खज़ाना है।

भारत में आम की पैदावार दुनिया में सबसे ज्यादा होती है। उसके बाद चीन और फिर थाईलैंड का नंबर आता है। देश में करीब 51 किस्म के आम प्रचलित है। इन में दस किस्म के आमों को GI टैग मिला है।खासकर महाराष्ट्र के अल्फाजो, उत्तर प्रदेश के मलीहाबादी, दशहरी, गुजरात के गिर केसर, बिहार के जर्दालु, और बंगाल के हिमसागर, लक्ष्मण भोग की काफी मांग है।

एपीडा के मुताबिक सबसे ज्यादा निर्यात यूएई, अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय यूनियन देशों को होता है।

APEDA

Export Volume FY24 (MT) Exported in FY24 (USD Mil)
Mango 32,104.09 60.14

Major Export Destinations (2023-24)
United Arab Emts, U.K, USA, Kuwait, and Qatar.

खासकर पिछले सालों में अमेरिका से मांग और बढ़ी है। अकेले यूएई से उत्तर प्रदेश को 1000 मीट्रिक टन का आर्डर मई तक मिल चुका था। कई और देशों ने यूपी के दशहरी, लगड़ा में रुचि दिखाई है। बंगाल के हिमसागर, फ़ाजिल और लक्ष्मण भोग की भी काफी डिमांड है। बंगाल में मालदा जिला, आम पैदावार और निर्यात का बड़ा केंद्र है। गुजरात के गिर केसर किस्म को भी विदेशों में खूब पसंद किया जाता है।

पिछले साल भी आम की फसल पर मौसम के उतार-चढ़ाव का असर रहा था। मेरठ के बड़े किसान वकील चौहान ने कहा कि बागानों में आम के मंजर पर फऱवरी की ठंड से कुप्रभाव पड़ा। फिर अप्रैल में बारिश हुई, इस कारण फसल कमजोर रही। बागानों से आम 20 से 25 रुपए के रेट पर निकला है। दूसरी ओर बिहार के दरभंगा में आम बागान के मालिक अंजनी मिश्रा कहते है कि आम की पैदावार कम हुई है।  बागानों से आम 30 से 40 रुपए के बीच निकला । उनके यहां मालदा,किशनभोग और कलकत्तिया आम की पैदावार हुई।

दुनिया की कुल आम पैदावार में भारत की हिस्सेदारी 41 फीसदी से ज्यादा है। भारतीय आम की दस से ज्यादा किस्में दुनिया भर में लोकप्रिय है। केंद्र सरकार उन कृषि तकनीकों पर खास ध्यान दे रही है जिससे आम की किस्में और पैदावार बढ़े । मिसाल के तौर पर यूपी के बस्ती जनपद के इंडो इजरायल सेंटर ऑफ एक्सिलेंस फॉर मैंगो और कृषि विज्ञान केंद्र में नई किस्म टॉमी एटकिंस के अलावा आम्रपाली, मल्लिका और कपूरी लंगड़ा की पौध लेने दूर-दूर से किसान आते है।आम्रपाली आम का वृक्ष सबसे कम जगह घेरता है और अन्य आमों के बाद इसकी फसल बाज़ार में आती है। देर से आने वाली पैदावार से किसान ज्यादा फायदा ले सकते है। यानि देर तक आम भी खाएं,पैसे भी कमाएं

आलोक रंजन

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