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“मिट्टी की सेहत सुधरेगी, आमदनी बढ़ेगी – बस अपनाएं प्राकृतिक खेती!”

प्राकृतिक खेती अपनाएं, लागत घटाएं और मृदा स्वास्थ्य सुधारें:गन्ना आयुक्त वर्चुअल संगोष्ठी में प्रदेशभर के किसानों को दी गई प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रेरणा लखनऊ –उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से आयोजित एक वर्चुअल संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त श्री […]

प्राकृतिक खेती अपनाएं, लागत घटाएं और मृदा स्वास्थ्य सुधारें:गन्ना आयुक्त

वर्चुअल संगोष्ठी में प्रदेशभर के किसानों को दी गई प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रेरणा

लखनऊ –उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से आयोजित एक वर्चुअल संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रदेश के गन्ना एवं चीनी आयुक्त श्री प्रमोद कुमार उपाध्याय ने कहा कि “प्राकृतिक खेती ही आज की आवश्यकता है। यह न केवल मृदा और पर्यावरण को सुरक्षित रखती है, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करती है। रासायनिक खेती के दुष्परिणाम स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं, अतः अब समय आ गया है कि किसान जैविक और प्राकृतिक विकल्पों को अपनाएं।”

इस संगोष्ठी का विषय था – गन्ने में प्राकृतिक खेती: विश्लेषण, विकास की संभावनाएं और चुनौतियां”, जिसमें प्रदेश के विभिन्न जनपदों से प्राकृतिक खेती से जुड़े अनुभवी किसानों ने भी भाग लिया।

प्राकृतिक खेती: एक स्थायी समाधान

गन्ना आयुक्त उपाध्याय ने कहा कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग से न केवल हमारी मिट्टी और जल प्रदूषित हो रहे हैं, बल्कि फसलों की गुणवत्ता भी गिर रही है। इसके चलते कई बार हमारे कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे नहीं उतरते और निर्यात में कठिनाइयां आती हैं।

उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती एक ऐसी कृषि पद्धति है, जिसमें बाहरी इनपुट की आवश्यकता नहीं होती। किसान अपनी देसी गाय, गोबर, गौमूत्र, नीम, आक, तुलसी आदि स्थानीय जैविक संसाधनों से ही आवश्यक उर्वरक और कीटनाशक तैयार कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप फसल की उत्पादन लागत में भारी कमी आती है, मृदा स्वास्थ्य बेहतर होता है और खाद्यान्न विषमुक्त एवं पौष्टिक बनते हैं।

किसानों को जागरूक करने की आवश्यकता

आयुक्त ने बताया कि प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए किसानों को पहले समझना, फिर सीखना और अंततः करना होगा। उन्होंने कहा कि खेत की मिट्टी से जितना उत्पादन लिया जाता है, उतना ही पोषण उसे लौटाना भी आवश्यक होता है। देसी गाय के गोबर व गौमूत्र से बनी जीवामृत, बीजामृत और घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक खाद इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं

किसानों के अनुभवों से सीखने का मौका

संगोष्ठी में सहारनपुर के सेठपाल सिंह ने बताया कि उन्होंने 5 वर्षों से अपनी गन्ने की फसल में किसी भी रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया और आज उनकी फसल की गुणवत्ता बाजार में विशेष मांग रखती है।

बुलंदशहर से आए भारत भूषण त्यागी और संजीव कुमार ने प्राकृतिक खेती के तीन मुख्य स्तंभ — समझना, सीखना और करना — पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि “जब तक किसान इन तीन बातों को व्यवहार में नहीं लाएंगे, तब तक खेती में आत्मनिर्भरता और टिकाऊ समाधान नहीं मिल पाएगा।”

बरेली जिले के अनिल कुमार ने बताया कि प्राकृतिक खेती से उन्हें हर सीजन में बेहतर उत्पादन और कम लागत के अनुभव हुए हैं। वहीं, शामली जिले के अरुण मलिक और ठाकुर धर्मपाल सिंह ने प्राकृतिक खेती में जीवामृत, घनजीवामृत व बीजामृत के उपयोग की विधि और लाभों को साझा किया।

वातावरण संरक्षण के लिए जरूरी है प्राकृतिक खेती

आयुक्त उपाध्याय ने चिंता जताई कि लगातार रासायनिक खेती से न केवल मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है, बल्कि वायु और जल भी प्रदूषित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि खेती में लागत बढ़ने के साथ किसान कर्ज़ के बोझ तले दबते जा रहे हैं। इससे उबरने के लिए प्राकृतिक खेती एकमात्र विकल्प है।

उन्होंने आश्वस्त किया कि राज्य सरकार किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए हर संभव सहयोग प्रदान करेगी। साथ ही, कृषि विभाग और गन्ना विभाग की ओर से प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन भी समय-समय पर दिया जाएगा।

कार्यक्रम में अधिकारी भी रहे मौजूद

इस ऑनलाइन कार्यक्रम में गन्ना विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, परिक्षेत्रीय अधिकारी और विभिन्न जिलों से आए कृषि विशेषज्ञों ने भी भाग लिया। संगोष्ठी के समापन पर अधिकारियों ने कहा कि भविष्य में इस प्रकार के और कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक खेती को समझ सकें और अपनाकर अपनी खेती को लाभकारी बना सकें।

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