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केले की भरपूर पैदावार का मंत्र: वैज्ञानिक तरीके अपनाएं

खेती को बनाएं लाभदायक, सीखें केले की उन्नत तकनीक समस्तीपुर (बिहार): केले की उन्नत खेती में उत्पादन को बढ़ाने के लिए भूमि का चयन और खेत की वैज्ञानिक तैयारी अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं। यह जानकारी कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह ने दी, जो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पूर्व सह […]

खेती को बनाएं लाभदायक, सीखें केले की उन्नत तकनीक

प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह

समस्तीपुर (बिहार): केले की उन्नत खेती में उत्पादन को बढ़ाने के लिए भूमि का चयन और खेत की वैज्ञानिक तैयारी अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं। यह जानकारी कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह ने दी, जो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पूर्व सह निदेशक अनुसंधान एवं फल अनुसंधान परियोजना के प्रमुख अन्वेषक भी रह चुके हैं।

उन्होंने कहा कि केला एक उष्णकटिबंधीय फसल है जो 15 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान और प्रचुर धूप में बेहतर पनपती है। इसलिए ऐसे क्षेत्र का चयन किया जाना चाहिए जहाँ जलजमाव न हो और जल निकासी उत्तम हो।

मृदा परीक्षण और सुधार: वैज्ञानिक खेती की पहली सीढ़ी

डॉ. सिंह के अनुसार, केले की खेती के लिए मध्यम भारी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है, जिसका pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो। अत्यधिक अम्लीय या क्षारीय मृदा के लिए मृदा परीक्षण कर आवश्यक सुधार (जैसे चूना या जिप्सम) करना चाहिए। साथ ही उसर भूमि में कार्बनिक खाद और पाइराइट का प्रयोग लाभकारी सिद्ध होता है।

खेत की तैयारी और जल प्रबंधन का महत्व

खेती से पहले खेत की गहरी जुताई (2-3 बार), खरपतवार की सफाई और जैविक खाद (गोबर, वर्मी कम्पोस्ट) का समुचित प्रयोग मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक होता है। केले का पौधा जलभराव सहन नहीं कर सकता, इसलिए जल निकासी व्यवस्था तथा ड्रिप इरिगेशन प्रणाली अत्यंत लाभकारी साबित होती है।

गड्ढा खुदाई, भराई और रोपण में सावधानी जरूरी

डॉ. सिंह बताते हैं कि केले के पौधों के लिए 1.5×1.5 मीटर या 2×2 मीटर दूरी पर गड्ढे बनाए जाएं। इनमें गोबर की खाद, नीम खली, कीटनाशक और ऊपर की मिट्टी मिलाकर भराव किया जाए। रोगाणु नष्ट करने हेतु गड्ढों को 15 दिन तक खुला छोड़ना जरूरी है।

रोगमुक्त पौधे और जैविक मल्चिंग की भूमिका

टिशू कल्चर या प्रमाणित स्रोतों से लिए गए स्वस्थ और रोगमुक्त पौधे ही लगाए जाएं। रोपण के समय जैविक मल्चिंग (भूसा, पराली) से नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण और पोषण सुनिश्चित किया जा सकता है।

तेज हवाओं से सुरक्षा और अंतरवर्तीय फसलें

तेज हवाओं से बचाव हेतु वायुवरोधी पौधों की घेराबंदी करें और पौधों को सहारा देने हेतु मजबूत डंडों का उपयोग करें। साथ ही प्रारंभिक महीनों में खेत की खुली जगहों में मूली, फूलगोभी, हल्दी, अदरक जैसी अंतरवर्तीय फसलें उगाकर अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा सकती है।

पोषण प्रबंधन और कीट नियंत्रण में अपनाएं जैविक उपाय

डॉ. सिंह ने जोर दिया कि मिट्टी में पोषक तत्वों की नियमित निगरानी, जैविक खादों का उपयोग और आईपीएम (एकीकृत कीट प्रबंधन) तकनीक से रोग नियंत्रण कर खेती को सतत बनाया जा सकता है। खासतौर पर फोक ट्रॉपिकल रेस-4 जैसे गंभीर रोगों से बचने के लिए रोगप्रतिरोधी किस्में अपनाना आवश्यक है।

भूमि का चयन और खेत की तैयारी केले की खेती की सफलता का आधार है। यदि किसान इन शुरुआती चरणों में वैज्ञानिक सलाह के अनुसार कार्य करते हैं, तो उत्पादकता में भारी वृद्धि संभव है। नियमित तकनीकी मार्गदर्शन, निरीक्षण और सिफारिशों का पालन उन्नत केला उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक है।

प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह
विभागाध्यक्ष, पौध रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी विभाग,
पूर्व सह निदेशक अनुसंधान एवं प्रधान अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर 
📧 ईमेल: sksraupusa@gmail.com / sksingh@rpcau.ac.in
फोटो: प्रतीकात्मक(AI)
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