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टिकाऊ पशुपालन के लिए आयुर्वेद से मदद!

नरेश पाल गंगवार ने बताया कैसे आयुर्वेद बचा सकता है पशुधन टिकाऊ पशुपालन के लिए आयुर्वेद आधारित पशु चिकित्सा पद्धतियों को अपनाना आवश्यक: नरेश पाल गंगवार नई दिल्ली: मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने 10वें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर एक विशेष वर्चुअल जागरूकता कार्यक्रम […]

नरेश पाल गंगवार ने बताया कैसे आयुर्वेद बचा सकता है पशुधन

टिकाऊ पशुपालन के लिए आयुर्वेद आधारित पशु चिकित्सा पद्धतियों को अपनाना आवश्यक: नरेश पाल गंगवार

नई दिल्ली: मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने 10वें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर एक विशेष वर्चुअल जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम कॉमन सर्विस सेंटर्स (सीएससी) नेटवर्क के माध्यम से आयोजित किया गया, जिसका मुख्य विषय था जन-जन के लिए आयुर्वेद, धरती के लिए आयुर्वेद

यह कार्यक्रम कॉमन सर्विस सेंटर्स (सीएससी) नेटवर्क के माध्यम से आयोजित हुआ, जिसमें देशभर के 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2,000 से अधिक सीएससी केंद्रों से पशुपालक जुड़े और एक लाख से ज्यादा किसानों ने सक्रिय भागीदारी दर्ज की।

गंगवार ने बताया – आयुर्वेद और आधुनिक पद्धतियों का होना चाहिए समन्वय

कार्यक्रम की अध्यक्षता डीएएचडी के सचिव नरेश पाल गंगवार ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पशुपालन क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों, विशेषकर एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance – AMR) से निपटने के लिए एथनो वेटरनरी मेडिसिन (EVM) एक बेहतर और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद को आधुनिक पशु चिकित्सा पद्धतियों के साथ जोड़ना टिकाऊ पशुधन स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी है। इससे न केवल किसानों का खर्च घटेगा बल्कि पशुधन का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा।”

‘बोवाइन मैस्टाइटिस’ में हर्बल उपचार प्रभावी: वर्षा जोशी

इस कार्यक्रम में डीएएचडी की अपर सचिव सुश्री वर्षा जोशी ने अपने विचार रखते हुए ‘बोवाइन मैस्टाइटिस’ (गोजातीय स्तनदाह) जैसी गंभीर बीमारी के उपचार में हर्बल और आयुर्वेद आधारित पद्धतियों की प्रभावशीलता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि “यदि हम सिंथेटिक एंटीबायोटिक दवाओं की जगह पारंपरिक उपचार अपनाएं तो पशुपालक एंटीबायोटिक दवाओं के अति प्रयोग से बच सकते हैं और रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है।”

प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता पर विशेष जोर

10वें आयुर्वेद दिवस समारोह के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग, औषधीय पौधों और जैव विविधता के संरक्षण पर भी प्रकाश डाला। विशेषज्ञों ने बताया कि आयुर्वेद आधारित पशु चिकित्सा न केवल रोग प्रबंधन में प्रभावी है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाती है।

डीएएचडी की पहल से बढ़ेगी किसानों की जागरूकता

डीएएचडी ने स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम उनके व्यापक प्रयासों का हिस्सा है, जिसके तहत पशुपालकों को सुरक्षित, किफायती और प्रभावी उपचार विकल्प उपलब्ध कराए जाएंगे। मंत्रालय ने आश्वासन दिया कि आने वाले समय में ऐसे और कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि ईवीएम और आयुर्वेद आधारित उपचार पद्धतियों को व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके।

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