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जैसलमेर में जल संरक्षण की नई पहल—शुष्क भूमि कृषि पर खास प्रशिक्षण

पोकरण में वर्षाजल प्रबंधन का प्रशिक्षण, विशेषज्ञों ने बताए कारगर उपाय पोकरण में समुदाय स्तर पर वर्षाजल प्रबंधन एवं शुष्क भूमि कृषि पर प्रशिक्षण आयोजित, विशेषज्ञों ने कहा—“जल बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाया जा सकता है” पोकरण (जैसलमेर)। कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) पोकरण में रविवार को वर्षा आधारित खेती की उत्पादकता बढ़ाने और समुदाय […]

पोकरण में वर्षाजल प्रबंधन का प्रशिक्षण, विशेषज्ञों ने बताए कारगर उपाय

पोकरण में समुदाय स्तर पर वर्षाजल प्रबंधन एवं शुष्क भूमि कृषि पर प्रशिक्षण आयोजित, विशेषज्ञों ने कहा—“जल बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाया जा सकता है

पोकरण (जैसलमेर)। कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) पोकरण में रविवार को वर्षा आधारित खेती की उत्पादकता बढ़ाने और समुदाय को जल-सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से वर्षाजल प्रबंधन एवं शुष्क भूमि कृषि पर एकदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास विज्ञान समिति (ग्राविस) के सहयोग से आयोजित हुआ, जिसमें भैसड़ा, खैतासर और माधोपुरा सहित आसपास के गांवों से कई कृषक महिलाएं और किसान बड़ी संख्या में शामिल हुए।

जल संरक्षण ही भविष्य की कुंजी: डॉ. दशरथ प्रसाद

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दशरथ प्रसाद ने कहा कि विश्वभर में पानी की कमी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है, लेकिन जैसलमेर जैसे रेगिस्तानी जिले में यह स्थिति और अधिक संवेदनशील है। उन्होंने कहा,
“जल बनाया नहीं जा सकता, केवल बचाया जा सकता है। इसीलिए हमें प्रत्येक बूंद को सहेजने की जरूरत है। वर्षा जल का वैज्ञानिक तरीके से संग्रहण और संरक्षण कर कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी कृषि को स्थिर और टिकाऊ बनाया जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही जल संरक्षण संबंधी फ्लैगशिप योजनाओं का लाभ उठाकर गांवों में छोटे-बड़े जल ढांचों का निर्माण किया जाना चाहिए। ऐसे ढांचे भूजल पुनर्भरण को बढ़ाते हैं, जिससे किसानों को रबी सीजन में भी सिंचाई के अवसर मिल सकते हैं।

खेत स्तर पर जल-संरक्षण तकनीक बेहद उपयोगी

प्रसार वैज्ञानिक डॉ. सुनील शर्मा ने प्रतिभागियों को खेत स्तर पर जल संरक्षण के विभिन्न उपायों की जानकारी दी। उन्होंने मेड़बंधी, फील्ड बंडिंग, फार्म पोंड निर्माण और रूफ-टॉप हार्वेस्टिंग को अत्यंत प्रभावी तकनीक बताया।
उन्होंने कहा कि वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में फसल चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां ज्वार, बाजरा, मूंग, ग्वार जैसी कम पानी वाली फसलें और उनकी उन्नत किस्में अधिक लाभकारी सिद्ध होती हैं। उन्होंने फसल विविधीकरण अपनाने पर भी जोर दिया।

माइक्रो-इरिगेशन समय की मांग: डॉ. ढाका

वैज्ञानिक डॉ. राम निवास ढाका ने सामुदायिक आधारित जल प्रबंधन, कृषक समूहों की भूमिका और निर्णय-प्रक्रिया पर विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए माइक्रो-इरिगेशन तकनीकें—जैसे ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर सिस्टम—बहुत प्रभावी हैं। कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती है और फसल उत्पादकता भी बढ़ती है।

किचन गार्डन से पोषण सुरक्षा

सस्य वैज्ञानिक डॉ. कृष्ण गोपाल व्यास ने किचन गार्डन की उपयोगिता पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि घर के आसपास उपलब्ध खाली भूमि, रसोईघर और बाथरूम के बहते पानी का सही उपयोग कर परिवार के लिए स्वास्थ्यवर्धक, ताज़ी और जैविक सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है। इससे घर की पोषण सुरक्षा तो मजबूत होती ही है, साथ ही खर्च में भी कमी आती है।

प्रतिभागियों ने तकनीकों का किया प्रत्यक्ष अवलोकन

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को वर्षाजल प्रबंधन से जुड़े प्रायोगिक प्रदर्शन दिखाए। किसानों ने भी तकनीकों से संबंधित प्रश्न पूछे, जिनका समाधान विशेषज्ञों द्वारा विस्तार से किया गया।

“वर्षा जल संरक्षण को सामुदायिक अभियान बनाएं”—ग्राविस

ग्राविस प्रतिनिधि शीतल भाटी ने ग्रामीणों से अपील की कि वे वर्षाजल संरक्षण को केवल तकनीक नहीं, बल्कि समुदायिक जिम्मेदारी के रूप में अपनाएं। उन्होंने कहा कि यदि गांव स्तर पर सामुदायिक जल संरचनाओं का निर्माण और रखरखाव किया जाए, तो गांव जल-स्मार्ट और जल-समृद्ध बन सकते हैं।

बड़ी संख्या में कृषक महिलाओं की भागीदारी

प्रशिक्षण में भैसड़ा, खैतासर और माधोपुरा ग्रामों से आई कृषक महिलाएं—गीता कंवर, कमला कंवर, पार्वती कंवर, मीना, गोमती, लहर कंवर और जेठू सिंह भाटी—ने सक्रिय भागीदारी की।

कार्यक्रम का समापन प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरण और सामूहिक जल संरक्षण संकल्प के साथ हुआ।

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