खेती में रोबोटिक्स की दस्तक, किसानों को मिलेगी श्रम से राहत!
विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली | भारतीय कृषि अब परंपरागत तरीकों से आगे बढ़कर स्मार्ट और तकनीक आधारित युग में प्रवेश कर रही है। इसी कड़ी में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली के कृषि अभियांत्रिकी संभाग ने कई उन्नत कृषि मशीनों और रोबोटिक तकनीकों का प्रदर्शन किया, जो खेती को अधिक लाभकारी और कम श्रम आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।
“लक्ष्य है लागत घटाना और उत्पादन बढ़ाना”

कृषि टाइम्स से विशेष बातचीत में डॉ. दिलीप कुमार कुशवाहा ने बताया कि संस्थान का उद्देश्य ऐसी तकनीकों को विकसित करना है, जो किसानों की उत्पादन लागत कम करें और आय में वृद्धि सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि बदलते समय में कृषि यंत्रीकरण और रोबोटिक्स ही खेती को टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।
धान रोपाई में रोबोट से आसान होगा काम
धान की रोपाई को खेती का सबसे कठिन कार्य माना जाता है। कीचड़ भरे खेत में घंटों झुककर काम करना किसानों के लिए थकाऊ और स्वास्थ्य के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। इस समस्या के समाधान के लिए संस्थान ने रोबोटिक पैडी ट्रांसप्लांटर विकसित किया है, जिसे रिमोट से संचालित किया जा सकता है। यह मशीन समान दूरी पर पौध रोपाई कर बेहतर फसल वृद्धि सुनिश्चित करती है और श्रम लागत में उल्लेखनीय कमी लाती है।
सेंसर आधारित छिड़काव से दवा की बचत
कीटनाशक छिड़काव के क्षेत्र में भी संस्थान ने रोबोटिक पेस्टिसाइड एप्लीकेटर विकसित किया है। यह मशीन फसल की ऊंचाई और घनत्व को पहचानकर जरूरत के अनुसार ही छिड़काव करती है। इससे दवाओं की खपत कम होती है, पर्यावरणीय प्रभाव घटता है और किसान की सुरक्षा बढ़ती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक ग्रीनहाउस और खुले खेत दोनों के लिए कारगर साबित हो सकती है।
मसाला फसलों के लिए खास समाधान
राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में जीरा, धनिया और मेथी जैसी कम ऊंचाई वाली फसलें बड़े हार्वेस्टर से नहीं कट पातीं। इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए विशेष कटर बार और कन्वेयर सिस्टम से लैस हार्वेस्टिंग रोबोट तैयार किया गया है। यह मशीन फसल को काटकर सीधे बैग में संग्रहित करती है, जिससे नुकसान कम होता है और दक्षता बढ़ती है।
छोटे किसानों के लिए किफायती विकल्प
डॉ. कुशवाहा ने बताया कि सीमांत और छोटे किसानों के लिए इलेक्ट्रिक प्राइम मूवर विकसित किया गया है, जो हल्की जुताई और गुड़ाई के लिए उपयुक्त है। इसे महिलाएं भी आसानी से चला सकती हैं। इसके अलावा पूसा एक्वा फर्टी-सीड ड्रिल उर्वरकों को घोल के रूप में बीज के पास डालती है, जिससे अंकुरण दर और उत्पादन में सुधार होता है।
पशुपालन को मिलेगा नया आयाम
पशुपालकों के लिए पूसा मोबाइल फॉडर ब्लॉक मशीन भूसे को चारा ब्लॉक में बदलती है। यह मशीन खेत पर ही संचालित की जा सकती है और प्रति घंटे 100 किलोग्राम से अधिक उत्पादन की क्षमता रखती है। इससे चारे का बेहतर भंडारण और परिवहन संभव हो पाता है।
आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि इन तकनीकों के व्यापक उपयोग से भारतीय कृषि में उत्पादकता और लाभप्रदता दोनों में वृद्धि संभव है। डॉ. कुशवाहा ने किसानों से अपील की कि वे आधुनिक तकनीकों को अपनाकर खेती को व्यवसायिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।
कृषि क्षेत्र में हो रहा यह तकनीकी बदलाव आने वाले वर्षों में खेती की तस्वीर बदल सकता है।
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