अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: खेत से बाजार तक महिलाओं की भागीदारी से मजबूत हो रही गांवों की अर्थव्यवस्था
नई दिल्ली, 8 मार्च (विशेष रिपोर्ट):–ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। खेत की तैयारी से लेकर बुवाई, निराई-गुड़ाई, कटाई, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण तक महिलाओं की सक्रिय भागीदारी न केवल खेती को मजबूती दे रही है, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था को भी नई गति प्रदान कर रही है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) के अवसर पर यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अब केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि कृषि प्रबंधन और ग्रामीण उद्यमिता की प्रमुख भागीदार बनकर उभर रही हैं।
खेती के हर चरण में महिलाओं की भागीदारी
भारत में कृषि कार्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी काफी बड़ी है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 60 से 70 प्रतिशत कृषि गतिविधियों में महिलाओं का योगदान होता है। बीज चयन, पौध रोपण, फसल की देखभाल और कटाई जैसे कार्यों में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसके अलावा पशुपालन, डेयरी, मुर्गीपालन, मधुमक्खी पालन और सब्जी की खेती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखी जा रही है। कई राज्यों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सामूहिक खेती और कृषि आधारित छोटे उद्योग भी चला रही हैं।
स्वयं सहायता समूहों से बढ़ रही आर्थिक ताकत
ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन समूहों के माध्यम से महिलाएं न केवल बचत और ऋण गतिविधियों से जुड़ रही हैं, बल्कि कृषि प्रसंस्करण, खाद्य उत्पाद निर्माण, हस्तशिल्प और ग्रामीण उद्यमिता में भी कदम बढ़ा रही हैं।
इन समूहों के जरिए महिलाएं अचार, पापड़, मसाले, जैविक खाद और अन्य कृषि उत्पादों का उत्पादन कर स्थानीय बाजारों में बेच रही हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो रही है और गांवों की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।
कृषि नवाचार में भी महिलाएं आगे
पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की भागीदारी आधुनिक कृषि तकनीकों में भी बढ़ी है। कई महिला किसान जैविक खेती, औषधीय पौधों की खेती, मशरूम उत्पादन और बागवानी जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को अपनाकर बेहतर आय अर्जित कर रही हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ा जा रहा है। इससे महिलाओं की दक्षता और आत्मनिर्भरता दोनों बढ़ रही हैं।
चुनौतियां अभी भी बरकरार
हालांकि कृषि में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन उन्हें अभी भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भूमि स्वामित्व में महिलाओं की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है, जिससे उन्हें कई सरकारी योजनाओं और बैंकिंग सुविधाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
इसके अलावा तकनीकी प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच और कृषि उपकरणों की उपलब्धता जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं। जानकारों का कहना है कि यदि महिलाओं को कृषि संसाधनों और प्रशिक्षण तक बेहतर पहुंच मिले, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की विकास दर और तेज हो सकती है।
भविष्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका
विशेषज्ञ कहते हैं कि आने वाले समय में ग्रामीण विकास और कृषि क्षेत्र की प्रगति में महिलाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होने वाली है। महिला किसानों को तकनीक, वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़कर उन्हें कृषि मूल्य श्रृंखला का मजबूत हिस्सा बनाया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महिलाओं का योगदान अमूल्य है। यदि उन्हें सही अवसर और संसाधन मिलें, तो वे न केवल खेती-किसानी को नई दिशा देंगी, बल्कि गांवों की समग्र आर्थिक प्रगति की भी प्रमुख आधारशिला बनेंगी।

