Krishi Times Header
लोड हो रहा है...  |  Krishi Times
  • Home  
  • लीची की उपज बढ़ाने में सहायक है मधुमक्खी पालन
- बागवानी

लीची की उपज बढ़ाने में सहायक है मधुमक्खी पालन

“शहद और लीची का गहरा संबंध – जानें खेती के फायदे” लीची को ‘फलों की रानी’ कहा जाता है, और इसकी मीठी सुगंध, सुंदरता और स्वाद इसे खास बनाते हैं। जब लीची के पेड़ों पर फूल खिलते हैं, तो पूरा बाग किसी स्वर्गिक नज़ारे जैसा लगता है। इन फूलों से उठती हल्की सुगंध और मधुमक्खियों […]

“शहद और लीची का गहरा संबंध – जानें खेती के फायदे”

लीची को ‘फलों की रानी’ कहा जाता है, और इसकी मीठी सुगंध, सुंदरता और स्वाद इसे खास बनाते हैं। जब लीची के पेड़ों पर फूल खिलते हैं, तो पूरा बाग किसी स्वर्गिक नज़ारे जैसा लगता है। इन फूलों से उठती हल्की सुगंध और मधुमक्खियों की गूंज इसे और भी खास बना देती है।

प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह
लीची के बाग में मधुमक्खियों का स्वागत

जब लीची के फूल खिलते हैं, तो बाग में मधुमक्खियों का अद्भुत संसार बस जाता है। ये परागणकर्ता पूरी निष्ठा से अपने कार्य में लीन रहती हैं। यदि कोई ध्यान से लीची के बाग से गुजरे, तो मधुमक्खियों की गुंजार की मधुर ध्वनि सुनाई देती है। अनुभवी बागवान इस प्राकृतिक प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि मधुमक्खियों की उपस्थिति से परागण सुचारू रूप से होता है।

लीची उत्पादन बढ़ाने और प्रभावी परागण सुनिश्चित करने के लिए एक सतर्क बागवान प्रति हेक्टेयर 20 से 25 मधुमक्खी बॉक्स स्थापित करता है। इससे दोहरा लाभ मिलता है—पहला, फूलों का बेहतर परागण होता है, जिससे फल बनने की दर अधिक होती है, और दूसरा, उच्च गुणवत्ता वाली शहद प्राप्त होती है, जो अतिरिक्त आय का अच्छा स्रोत बनती है।

लीची के फूल: आकर्षक संरचना

लीची के वृक्ष सदाबहार होते हैं और अपने सुगंधित, आकर्षक फूलों के लिए जाने जाते हैं। ये छोटे, नाजुक और हल्की सुगंध वाले होते हैं, जो आमतौर पर सफेद या पीले-सफेद रंग के होते हैं। इनका आकार लगभग 5-6 मिमी व्यास का होता है।

लीची के पेड़ों पर फूल आने का समय जलवायु परिस्थितियों पर निर्भर करता है, लेकिन आमतौर पर ये मार्च से मई के बीच खिलते हैं। फूल 300 से 500 के बड़े समूहों में होते हैं, जिन्हें पुष्पगुच्छ (inflorescence) कहा जाता है। प्रत्येक पुष्पगुच्छ लगभग 20-30 सेमी लंबा होता है और शाखाओं से नीचे की ओर लटकता है।

फूलों की संरचना
  • बाह्यदलपुंज (Calyx) – पाँच पालियों से युक्त
  • पुष्पदल (Petals) – पाँच हल्के मुड़े हुए पंखुड़ियों से बना
  • पुंकेसर (Stamens) – दस पुंकेसर होते हैं, जिनके तंतु सफेद और परागकोष पीले रंग के होते हैं
  • स्त्रीकेसर (Carpel) – पुंकेसर से घिरा होता है और फल बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है
परागण और फल बनने की प्रक्रिया

लीची के फूलों का परागण मुख्य रूप से मधुमक्खियों द्वारा किया जाता है। ये फूल अपनी मीठी सुगंध और अमृत के कारण मधुमक्खियों को आकर्षित करते हैं। मधुमक्खियाँ फूलों के बीच पराग स्थानांतरित करती हैं, जिससे निषेचन की प्रक्रिया पूरी होती है और फल बनने लगते हैं।

परागण के बाद, फूल धीरे-धीरे फल में परिवर्तित होने लगते हैं। पहले ये छोटे और हरे होते हैं, लेकिन समय के साथ इनका आकार बढ़ता है और वे गुलाबी-लाल रंग के खुरदुरी त्वचा वाले फलों में बदल जाते हैं। इन फलों के अंदर एक स्वादिष्ट, सफेद, पारभासी गूदा होता है, जिसमें एक भूरे रंग का बीज होता है।

परागण के समय कृषि रसायनों से बचाव

जब लीची के पेड़ फूलों से लदे होते हैं, तो कीटनाशक या कृषि रसायनों का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे दो प्रमुख नुकसान हो सकते हैं:

  1. फूलों की क्षति – लीची के फूल नाजुक होते हैं, और रसायनों के संपर्क में आने से वे झुलस सकते हैं या मर सकते हैं, जिससे फल बनने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
  2. मधुमक्खियों पर प्रभाव – कीटनाशकों का प्रयोग मधुमक्खियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। यदि मधुमक्खियाँ प्रभावित होती हैं, तो वे परागण छोड़कर बाग से दूर चली जाती हैं, जिससे परागण अधूरा रह जाता है और फल बनने की संभावना कम हो जाती है।

इसलिए, एक समझदार बागवान इस संवेदनशील समय पर कृषि रसायनों से बचता है और प्राकृतिक तरीके अपनाकर लीची के फूलों की दुनिया को सुरक्षित रखता है।

लीची के फूल केवल सुंदरता के प्रतीक नहीं, बल्कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये मधुमक्खियों को आकर्षित कर परागण की प्रक्रिया को सुचारू बनाते हैं और अंततः स्वादिष्ट फलों के निर्माण में सहायक होते हैं। लीची उत्पादकों को चाहिए कि वे परागण को बढ़ावा देने के लिए मधुमक्खियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करें।

जब अगली बार आप लीची के बाग में जाएँ, तो फूलों की खुशबू के साथ मधुमक्खियों की गूंजती ध्वनि को सुनें और इस प्रकृति के अद्भुत चक्र का आनंद लें।

सौजन्य:
प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह
हेड, केला अनुसंधान केंद्र,गोरौल,हाजीपुर
विभागाध्यक्ष, पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, पूसा-848 125, समस्तीपुर, 
Email: sksraupusa@gmail.com

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *