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केला किसानों के लिए खतरा: पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग फैला!

केले की फसल पर नई बीमारी का हमला, जानिए समाधान पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग: केला फसल के लिए गंभीर चुनौती, वैज्ञानिक प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह  ने बताए रोकथाम के उपाय समस्तीपुर/पूसा। भारत में केला किसानों की आमदनी और फल पैदावार का एक बड़ा आधार है। देश के कई राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर […]

केले की फसल पर नई बीमारी का हमला, जानिए समाधान

पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग: केला फसल के लिए गंभीर चुनौती, वैज्ञानिक प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह  ने बताए रोकथाम के उपाय

प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह

समस्तीपुर/पूसा। भारत में केला किसानों की आमदनी और फल पैदावार का एक बड़ा आधार है। देश के कई राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन अब इस फसल के सामने एक नई और गंभीर समस्या उभरकर आई है—पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग। यह रोग केले के फलों और पत्तियों पर असर डालकर उत्पादन की गुणवत्ता को घटाता है और किसानों की आय को सीधे प्रभावित करता है।

बिहार और उत्तर प्रदेश में फैलाव

अब तक यह रोग केवल केरल और गुजरात राज्यों में रिपोर्ट हुआ था। लेकिन वर्ष 2022 में पहली बार बिहार के सीतामढ़ी जिले में इसकी पहचान हुई। उस समय शुरुआती संक्रमण दर लगभग 1 प्रतिशत फलों में दर्ज की गई थी।

पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में यह रोग लगभग 50 एकड़ क्षेत्र में फैल गया, जहाँ संक्रमण दर 5 से 45 प्रतिशत तक पहुँची। इस वर्ष भी विभिन्न जिलों से इसके प्रकोप की खबरें मिल रही हैं, जिससे किसानों में गहरी चिंता है।

रोग के लक्षण

कृषि वैज्ञानिक के अनुसार इस रोग के लक्षण मुख्य रूप से केले की परिपक्व पत्तियों, मिड्रिब, पेटीओल, पेडुनेकल और फलों की सतह पर दिखाई देते हैं।

फलों पर गड्ढे जैसे धब्बे बन जाते हैं।

पत्तियों पर काले-भूरे बदसूरत चकत्ते दिखते हैं।

बंच के तनों पर सड़न जैसी स्थिति बनती है।

हालाँकि इस रोग से फलों का गूदा सुरक्षित रहता है, लेकिन बाहरी स्वरूप बिगड़ने से केले की बाजार में कीमत कम हो जाती है और किसानों को घाटे में बेचना पड़ता है।

संक्रमण के कारण

विशेषज्ञ के अनुसार रोग के फैलाव के प्रमुख कारण हैं

अत्यधिक वर्षा

खेत में जलभराव और नमी

खराब जल निकासी

घनी बागवानी

इन परिस्थितियों में फफूंद तेजी से पनपता है और फसल को नुकसान पहुँचाता है।

किसानों की बढ़ी परेशानी

पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग नई समस्या होने के कारण कई कृषि प्रसार कर्मी व सलाहकार भी इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं दे पा रहे हैं। नतीजतन, किसानों में भ्रम की स्थिति है और उन्हें समाधान खोजने में कठिनाई हो रही है।

वैज्ञानिक प्रबंधन: बचाव ही सबसे बड़ा उपाय

केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल के प्रमुख प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह ने बताया कि इस रोग से बचाव के लिए समय रहते वैज्ञानिक उपाय अपनाना बेहद जरूरी है।

पौधों को पर्याप्त दूरी पर लगाएँ ताकि वायुप्रवाह बना रहे।

मुख्य तने के पास उगने वाले सककर (Side suckers) को समय-समय पर हटाएँ।

रोगग्रस्त व सूखी पत्तियों को काटकर खेत से बाहर करें।

खेत का जल निकास अच्छा रखें ताकि पानी जमा न हो।

रासायनिक प्रबंधन

फफूंदनाशकों का छिड़काव इस रोग को नियंत्रित करने में प्रभावी है।

Nativo, Caprio या Opera (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। बंच निकलने के बाद 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव जरूरी है। संक्रमण अधिक होने पर बंच निकलने से पहले एक अतिरिक्त छिड़काव करें।

कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या मैनकोजेब (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) का घोल बनाकर छिड़काव करें। ये दवाएँ रोग की गंभीरता को कम करने में सहायक साबित हुई हैं।

किसानों के लिए सलाह

खेत में केवल रोगमुक्त पौधों का प्रयोग करें।

संक्रमित सामग्री को खेत में न लाएँ।

अधिक वर्षा और आर्द्रता वाले मौसम में सतर्क रहें।

फसल की नियमित निगरानी करें।

निष्कर्ष

डॉ. सिंह ने कहा कि पीटिंग एवं ब्लास्ट रोग एक उभरती हुई चुनौती है। यदि किसान सजग होकर समय पर प्रबंधन करें तो इस समस्या से काफी हद तक बचाव संभव है। उन्होंने कहा कि “केला उत्पादकों को चाहिए कि वे वैज्ञानिक सलाह को अपनाएँ, ताकि न केवल फसल की गुणवत्ता बनी रहे बल्कि बाजार मूल्य भी सुनिश्चित हो सके।”

कृषि विभाग और अनुसंधान संस्थानों ने किसानों से अपील की है कि वे इस रोग के लक्षणों की जानकारी फैलाएँ और सुझाए गए प्रबंधन उपायों को अपनाकर आत्मविश्वास के साथ खेती करें।

प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह

विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं सूत्रकृमि विज्ञान विभाग, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा-848125, समस्तीपुर, बिहार sksraupusa@gmail.com / sksingh@rpcau.ac.in

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